पत्रकारों का हो रहा इस्तेमाल और शोषण


रोहित कुमार

इन्साफ एक्सप्रेस




हमारे भारत देश में पत्रकार अपनी आज़ादी खुद अपने हाथों से खोते जा रहे हैं पत्रकारों का शोषण मानो जैसे अब हमारे देश में एक मज़ाक सा बन के रह गया है पहले की पत्रकारिता में जनता पत्रकार को अच्छी और इज्ज़त की नज़र से देखती थी पत्रकारों को पूरा सामाजिक सम्मान मिलता था अगर कहीं भी कोई अनहोनी घटना होती थी तो पत्रकार अपना काम करने पहुँच जाया करते थे और लोगों को भी लगता था कि पत्रकार आ गए हैं अब उन की समस्या को सरकार ज़रूर सुनेगी लेकिन जैसे जैसे पत्रकारिता नए समय में जाने लगी तो बहुत सारे  मीडिया के सवरूप बनने लगे आज के समय हर कोई पत्रकार बनना चाहता है उस का भी एक कारन है कि कुछ पत्रकारों की वजह से लोगों को लगता है कि पत्रकार बहुत ताकत रखता है तो सभी पत्रकार ही बन जाते हैं और कुछ न सही पुलिस वाहन का चालान तो नहीं करेगी न .....पत्रकारों की यह दुर्दशा इनी पत्रकारों के मालिकों के कारन हो रही है क्यूंकि कोई समाचारपत्र या न्यूज़ चैनल का मालक अपने पत्रकारों को वेतन न दे कर सिर्फ एक कमीशन एजेंट बना कर भेज देता है अब बेचारा पत्रकार अपना घर चलाये या खबरों की तलाश में अपने वाहन में तेल फूंके इस लिए कई बार कुछ पत्रकारों को नेताओं के आगे झुकना पड़ता है उन की चापलूसी करनी पड़ती है जो बिलकुल गलत है जिस की वजह से आम लोगों की समस्याओं को पत्रकार उठा नहीं सकता क्यूंकि उसे भी पता है उन का अखबार या न्यूज़ चैनल लोगों की समस्या नहीं सिर्फ विज्ञापन उठाता है आज पत्रकारों से उन के मालक विज्ञापन मांगने लगे हैं जिस की वजह से पत्रकारों का काफी शोषण भी होता है और उन पर भ्रष्टाचार के आरोप तक लगा दिए जाते हैं कि वो पैसे मांगता है लेकिन वो बेचारा तो सिर्फ अपने मालक के कहने में आ कर किसी से ख़ास दिन पर विज्ञापन मांग रहा होता है क्यूंकि आज के पत्रकार को पता है कि अगर वो अपने अखबार या न्यूज़ चैनल के लिए विज्ञापन न जुटा सका तो उस की जगह लेने के लिए और भी बहुत सारे लोग लाइन में खड़े हैं उस की नौकरी तक जा सकती है यह सब हो रहा है पत्रकारिता को धंधा बनाने वाले लोगों की वजह से ...पहले के समय में पत्रकारिता एक धर्म सवरूप थी अभी यह एक प्रोफेशन है लेकिन इस प्रोफेशन में पत्रकार का मासिक वेतन न के बराबर होता है इस लिए सब पत्रकार विज्ञापन मार्किट में अपने आप को सिद्ध करने क लिए अपने ही साथी को पीछे धकेल आगे निकलने की होड़ में लगे हुए हैं पहले की पत्रकारिता में  ख़बरें लोगों से जुडी हुई होती थीं आज कल पत्रकारिता सिर्फ लोक सम्पर्क अधकारियों के इर्द-गिर्द घुमती नज़र आती है येही वो सब से बड़ी वजह है जिस से पत्रकार का शोषण होता है और होता रहेगा चुनाव आते ही हर खबर का रेट लगना  शुरू हो जाता है नेता पत्रकारों का खुलेआम इस्तेमाल करते हैं नेता अपनी मन पसंद खबरें लगवा कर आम जनता को गुमरहा करने का काम करते हैं और जब इन नेताओं का काम पत्रकार से निकल जाता है तो पीछे रह जाता है शोषण आज भारत की पत्रकारिता 180 देशों में 142 में पायदान पर आ चुकी है 2014 में यह आंकड़ा 136 पर था लेकिन अब की केंद्र सरकार ने पत्रकारों के मनोबल को इस तरह तोडा है कि आज हमारे देश की पत्रकारिता बीसाखी पर आ गई है आज के पत्रकार सरकार से सवाल पूछने में असमर्थ हैं बड़े बड़े पत्रकार नेताओं के तलवे चाटते हुए नज़र आते हैं वर्ल्ड प्रेस की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 60% से भी ज़यादा फेक खबरें आम जनता को परोसी जाती हैं और जब हम सरकार से सवाल पूछते हैं तो सरकार हमारे सवाल का जवाब क्यूँ देगी जब हम पत्रकार ही विज्ञापन के नाम पर भीक मांगते रहते हैं फिर क्यूँ पत्रकारों का शोषण होने पर बोखलाहट पत्रकारों में नज़र आती है आम जनता की समस्या को उठाने में आज हमारे देश का मीडिया इसी लिए डरता है क्यूंकि पत्रकारों को पता है कि आम लोगों की समस्या को उठाना मतलब लोकल नेता को नाखुश करना होता है और उस से हमारे पत्रकारों के विज्ञापन का बंद होना तह होता है सरकार की गलत नीतियों और पत्रकारों की कार्य प्रणाली आज देश के पत्रकारों को दिन-बा-दिन शोषण के अंधे कुंहे में धकेल रही है   
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