लुधियाना. दीना साहब मोगा के एक छोटे किसान घर में जन्में तोता सिंह (32) का सपना है पंजाब को प्रदूषण मुक्त करवाना। “जिस धरत दा खाइये उस नू अग्ग न लाइए’ के तहत अपनी जिद काे पूरा करने के लिए उन्हाेंने 6 साल से पराली जलाने के खिलाफ मुहिम छेड़ रखी है। 2014 में अपनी एक एकड़ खेती से यह मुहिम शुरू की थी और अब तक 25 हजार एकड़ जमीन पराली के दुष्प्रभावों से मुक्त करा दी है।
किसी भी काम काे अच्छे से पूरा करने को उसकी जानकारी जरूरी होती है। इसीलिए तोता सिंह ने संगरूर में 1 साल तक जगदीप कनोई नाम के एक्सपर्ट से हैप्पी सीडर और अन्य पराली संबंधित मशीनों के सही इस्तेमाल का तरीका सीखा। फिर अपनी एक एकड़ जमीन पर पराली न जलाने की कसम खाई। गांव-गांव घूमकर किसानों को पराली जलाने से नुकसान को समझाया। रायकोट में होम्योपैथिक डॉक्टर हरमिंदर सिंह सिद्धू (45) भी साथ जुड़ गए।
पहले जब भी तोता सिंह समझाते तो किसान गुस्सा करते, गालियां देते, सरकार का एजेंट तक कह देते। अब वही किसान ट्रेनिंग लेने के बाद पराली के नुकसान काे समझा तो सम्मान करते हैं। 2016 तक वे 1000 एकड़ जमीन, 2017 में 11000 एकड़ जमीन और अब लुधियाना, मोगा और बरनाला के 50 गांवों की 25,000 एकड़ जमीन पर पराली न जलाकर किसान उनका साथ रहे हैं।
जिन गांवों को अपनाया वहां 90% तक पराली जलाने से रोकने में मिली कामयाबी
हर अपनाए गए गांव में उन्हें सफलता मिल रही है और किसान उनकी बात भी समझने लगे हैं। उनके अपने ही आकलन के मुताबिक अलग-अलग गांवों में वे 60 प्रतिशत से लेकर 90 प्रतिशत तक किसानों को पराली जलाने से रोकने में सफल हुए हैं।
2020-21 में वे इसे शत प्रतिशत तक ले जाने का ध्येय लेकर चल रहे हैं और उन्हें यह विश्वास भी है कि वे ऐसा कर पाएंगे। 2019 में उन्होंने 7500 क्विंटल पराली 1000 रुपए प्रति एकड़ के हिसाब से गौशालाओं के साथ टाई अप कर बिकवाने का भी काम किया है। किसान हमारी बात मानने और पराली जलाने के नुकसान को जानने लगे हैं। 
हम खुद किसानों को उपलब्ध करा रहे 150 तरह की मशीनें
तोता सिंह ने बताया कि 50 से अधिक लोगों की टीम के साथ गांव-गांव घूमकर पता चल गया था कि दो बड़ी मुश्किलें आएंगी। पहली-हैप्पी सीडर जैसी मशीनों के इस्तेमाल की जरूरत। दूसरी- हैप्पी सीडर जैसी महंगी मशीनें खरीदने में किसान अक्षम थे। इसके लिए पीएयू लुधियाना से किसानों को मुफ्त ट्रेनिंग दिलाई। हम 150 से अधिक हैप्पी सीडर, रोटावेटर, बेलर जैसी मशीनें किसानों से केवल रखरखाव के खर्च पर देते हैं।
पराली जलाने से जमीन के पौष्टिक तत्व नष्ट हो जाते हैं। फिर इसकी पूर्ति केमिकल्स व स्प्रे से करते हैं। पराली की खाद डालें तो क्षतिपूर्ति एक साल में हो सकती है। हम किसानों को आर्गेनिक खेती के लिए प्रेरित करते हैं। किसान को जागरूक करने को गुरुद्वारों से अनाउंसमेंट हों, सरपंचों को पराली जलाने से रोकने की जिम्मेदारी सौंपनी चाहिए।
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