Kangra

Insaf express

Ravi kumar



भारत देश में अंग्रेजों से पहले अलग-अलग इलाकों में कई राजा राज्य में राज किया करते थे इसमें अधिकतर मुग़ल और राजपूत राजाओं के नाम शामिल है ज्यादातर  राजाओं को बड़े-बड़े महल और किले बनवाने का शौक होता था कई राजाओं ने ऐसे अद्भुत ,अनोखे और मजबूत किले बनवाए बहुत से किलों में से बहुत सारे किले आज भी सुरक्षित हैं और बहुत से लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र भी है ऐसा ही एक किला हिमाचल प्रदेश  के कांगड़ा जिले  में स्थित है इस किले को कांगड़ा का किला के नाम से जाना जाता है कांगड़ा किला का रहस्य आज भी लोगों के लिए पहेली ही है यह किला लगभग 463 एकड़ में फैला है कांगड़ा किला हिंदुस्तान की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का एक प्रमाण है। यहां पर एक ही छत के नीचे मां अम्बिका और पहले जैन तीर्थंकर आदिनाथ के मंदिर हैं।  साथ ही हिमाचल में मौजूद किलों में सबसे विशाल किला भी है कांगड़ा का यह विशाल किला रहस्यों से भरा हुआ है इस किले का निर्माण कार्य कब करवाया गया, इसके बारे में कोई भी जानकारी किसी के पास नहीं है इस किले का उल्लेख सिकंदर महान के युद्ध संबंधी दस्तावेजों में भी मिलता है जिससे इसके ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में मौजूद होना बताता है माना जाता है कि इसका निर्माण कांगड़ा राज्य कटोच वंश के राजपूत परिवार ने करवाया होगा  इस परिवार ने खुद को प्राचीन त्रिगत साम्राज्य के वंशज होने का प्रमाण दिया था साथ ही बता दें कि त्रिगत साम्राज्य का उल्लेख महाभारत में मिलता है


यह किला नगरकोट या कोट कांगड़ा के नाम से प्रसिद्घ है जो पुराने कांगड़ा नगर के दक्षिण-पश्चिम में स्थित है और यह बाणगंगा और पाताल गंगा नदियों जो किले के लिए खाई के रूप में काम करती हैं, के संगम पर खडी पहाड़ी के शीर्ष पर बना है। यह किला बहुत ही प्राचीन है। इस किले के भीतर वर्तमान अवशेष जैन और ब्राह्मणवादी मंदिरों के  भी हैं जो नौंवी-दसवीं शताब्दी ईसवी के हो सकते हैं। इतिहास के आख्यान में इसके प्रारंभिक उल्लेख, 1009 ईसवी में मोहम्मद गजनी द्वारा किए गए आक्रमण के समय के भी हैं। बाद में मोहम्मद तुगलक और उसके उत्तराधिकारी, फिरोजशाह तुगलक ने इस पर 1337 ईसवी और 1351 ईसवी में अपना कब्जा जमाया। बाणगंगा और मांझी नदियों के ऊपर स्थित कांगड़ा, 500 राजाओं की वंशावली के पूर्वज, राजा भूमचंद की 'त्रिगतरा' भूमि का राजधानी नगर था। कांगड़ा का किला प्रचुर धन-संपति के भण्डार के लिए इतना प्रसिद्घ था कि मोहम्मद गजनी ने भारत में अपने चौथे अभियान के दौरान पंजाब को हराया और सीधे ही 1009 ईसवी में कांगड़ा  पहुंचा। विशाल भवन जो राजाओं के लिए कभी चुनौती बने हुए थे, विशेष तौर पर सन 1905 में आए भूकंप के बाद खंडहरों में तबदील हो गए थे इस किले के प्रवेश मार्ग को बलुआ पत्थर से निर्मित मेहराब के कब्जों से जोडे गए मोटे काष्ठ के तख्तों का एक बडा द्वार लगाकर सुरक्षित किया गया था। इसकी ऊंचाई लगभग 15 फुट है। इसका नाम रणजीत सिंह द्वार है चट्टानों के बीच काटी गई एक खाई जो बाणगंगा और मांझी नदियों को जोड़ती है बाहरी दुनिया से इस किले को पृथक करती है



हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा किले का इतिहास भी काफी रोचक है साल 1615 ईस्वी में मुगल सम्राट अकबर ने किले को जीतने के लिए घेराबंदी कर दी थी लेकिन वह इस किले जीतने में असफल रहा था इसके बाद फिर 1620 ईस्वी में अकबर के बेटे जहांगीर ने चंबा के राजा को मजबूर करके इस किले पर कब्जा कर लिया था जहांगीर ने सूरज मल की सहायता से इस किले में अपने सैनिकों को प्रवेश करवाया था इसके बाद 1789 ईस्वी में कांगड़ा का किला एक बार फिर से वापस कटोच वंश के अधिकार में आ गया था तब राजा संसार चंद द्वितीय ने इसे मुगलों से आजाद करवाया था 1828 ईस्वी तक यह किला कटोचों के अधीन ही रहा, लेकिन राजा संसार चंद द्वितीय की मृत्यु के बाद इस किले पर महाराजा रणजीत सिंह कब्जा कर लिया था बाद में साल 1846 तक यह किला सिखों की देखरेख में रहा फिर इस पर अंग्रेजों ने डेरा जमा लिया था हालांकि 4 अप्रैल 1905 को आए एक भीषण भूकंप के बाद अंग्रजों ने किले को छोड़ दिया था भूकंप में इस किले को भारी क्षति हुई थी इससे कई बहुमूल्य कलाकृतियां और इमारतें किले के भीतर नष्ट हो गई थीं. हालांकि इसके बावजूद भी यह किला अपने आप में इतिहास की कई कहानियों को समेटे हुए है इस किले में आज भी सैकड़ों की संख्या में लोग पहुंचते हैं तथा भारत की प्राचीन भारतीय स्थापत्य कला के बारे में जानने की कोशिश करते रहते हैं कांगड़ा जिले का यह विशाल ओर रहस्यमय क़िला आज भी लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है



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